भक्ति अंत काल काम आएगी बात अच्छी बतलाई ,परवश होके मरते देखे काम न आई भक्ताई

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हड्डी मेरी टूट जानेके बाद अशक्ति आई  ,हौसलातो   है  मुझको यारो शरीरमे शक्ति नाई
आजकलके युवको  क्या करते है  ज़िंदगी भरमे कमाई   ,डिग्री लेते नौकरी  करते पिंशन  खाके मरजा ई
क्यारी बनाके केसरकि उसमे पिस्ता डाला  जाई   ,अंगूरी रसका पानी पिलाओ  प्याजकी गंध न जाई

मासर का  कभी गर्व न करना  न करना अदेखाई   ,ये है  तेरे जनि दुश्मन  धीरेसे  खा जाई
पडोशी तक पहचाने नहीं  जगमे कैसी बढ़ाई   ,साहसका कोई काम न किया हो  फोगट जिनगी गवाई
 जीनकारी  मार फाड़ और चोरी जैसी बुराई  ऐसे कुकर्म  छोड़ देनेसे  अपनी होगी भलाई
खार चुभनेसे  सारी जमिनको चमड़ा कैसे मढ़ाई   ,चमडकि जूती पहनो  वो खारसे  देगी बचाई
सिर्फ अपनहि ख्याल करके जिए  तो हम क्या  जिए भाई   ,ज़िंदादिली का तकाज़ा  एहै  ोरोके लिए जीते जाई
वामन  बनके   बलिराजासे प्रभुने किनी गदाई  ,कायनात लीनी तिन कदमोमे नाम  वामन रह जाई
अति बरिस्का बरसना न अच्छा  अति अच्छा  न धुप भाई   ,अति बशरका  बोलना न अच्छा  अति भली न चुपकाई 
फुलको खबर है मरजनेकि फिरभी हस्ते जाई  , मर्दुमको  मालुम है मरना रोकर जीवन बिताई 
ہدڈی میری ن ٹوٹ جانیکے بعد اسوھکتی ای  
حوصلہ    ہے   مر  ا     دل  مے  یارو   شریرنے  تکت  گواہی
 آجکلکے یوک  کیا کرتے ہے  زندگی بھرمی کمائی  ،  ڈگری لیتے  نوکری کرتے پنشن خاکے مر جی
کیاری بناکے کسرکی  اسمے پستا ڈالا جائی  انگور رثکا پانی پلاؤ  پیازکی گندہ ن جی
مصرکا  کبھی گرو ن کرنا نکرنا ادکھائی یہ ہے تیرے   جانی  دشمن  دھرسے  کھا جی
ہمسایہ پہچانے نہی  تو جگمے کیسی بدھi  ا     سہاسکا  کوئی کام کیا نہ ہو فوگٹھ زندگی گواہی
زنکاری مار فاد ور چوری جیسی برائی ایسے ککرم  چھوڈ دینےسے اپنی ھو چبھں  اپناہی   
وامن بنکے بلیراجسے  پربہنے کنی گدائی  کاینات لینی ٹن کدمومے  نام وامن رہ جی
اتی باریسکا  برسانا ن اچچھ اتی اچچھ دھوپ    نے  اتی بشر  کا بولنا ن اچچھ  ن اچھچھی چپکے      فلوکو خبر  ہے مرجنیکی  fi٩r بھی ہستے جی  مردمکو مالم ہے  مرنا فربہی ہستی جی   

6 responses to “भक्ति अंत काल काम आएगी बात अच्छी बतलाई ,परवश होके मरते देखे काम न आई भक्ताई

  1. સુરેશ June 30, 2016 at 4:26 pm

    सिर्फ अपनहि ख्याल करके जिए तो हम क्या जिए भाई ,ज़िंदादिली का तकाज़ा एहै ोरोके लिए जीते जाई |

    सच्ची बात कही ।

    • aataawaani July 1, 2016 at 3:38 am

      जब मेरे सुरेश भाई मुझे बिन याचना किए हुवे कॉमेंट देता है तब मुझे बहुत ख़ुशी होती है . परमेश्वर उसको हर प्रवृतिमे कामयाबी दे ,

  2. pragnaju July 4, 2016 at 5:31 am

    انتہائی کا بھلا نہ بولنا، انتہائی کی بھلی نہ چوپ،
    انتہائی کا بھلا نہ شاور، انتہائی کی بھلی نہ دھوپ. …

  3. pragnaju July 4, 2016 at 11:42 am

    अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः ।
    अतिदानात् बलिर्बद्धो अति सर्वत्र विर्जयेत् ।।

    अत्यधिक रूपवती होने के कारण सीता का अपहरण हुआ । रावण को अपने अत्यधिक बलवान् होने का अभिमान ही सर्वनाश करा दिया और राजा बलि का बड़ा दानी समझने का अहंकार ही अपनी शरीर को विष्णु-पग नपवाना और बंधना पड़ा । अतः अतिचार को निषिद्ध किया गया है ।
    कहते हैं अति सर्वत्र वर्जते यानी किसी भी चीज की अति दुखदायी होती है। चाहे वह अति खाने-पीने को लेकर हो, प्रेम या नफरत की हो, या अन्य किसी तरह की अति हमेशा दुख ही देती है।
    एक बार की बात है पृथ्वीपति भरत जिनके नाम पर भारत का नाम रखा गया। एक दिन वे नदी पर नहाने के लिए गए। वहां उस समय एक हिरनी पानी पीने आई। उस समय जब वह पानी पी चुकी थी। वहां अचानक शेर की आवाज सुनकर वह उछलकर नदी के तट पर चढ़ गई। बहुत ऊंचे स्थान पर चढऩे के कारण उसका गर्भपात हो गया। नदी लहरो के साथ उसके गर्भ से निकला बच्चा राजा भरत के पास पहुंचा। राजा भरत उसे अपने साथ आश्रम ले आए। वे उसका अपने बच्चों की तरह पालन-पोषण करने लगे।
    उसी के कारण उनका पूजा-पाठ आदि सब छुट गए। वे दिन रात बस उसी के चिंतन में लगे रहते। एक दिन आश्रम के पास एक हिरणों का झुंड आया। वह हिरण उन्हीं के साथ चला गया। जब वह बच्चा वापस नहीं लौटा तो राजा भरत सोचने लगे कि कहीं उसे किसी भेडि़ए ने तो नहीं खा लिया। क्या वह आज जंगल से लौटेगा या नहीं वे दिन रात बस उसी हिरण के बच्चे की चिंता करते रहते। जब उनकी मृत्यु का समय आया तब भी वे उसी हिरण के बारे में सोचते रहते थे। इसी तरह हिरण के वियोग में राजा भरत ने अपने प्राण त्याग दिए। यही कारण था कि उन्हें अगला जन्म हिरण के रूप में लेना पड़ा।

    इतने महान राजा को भी हिरण से प्रेम आसक्ति हो जाने के कारण अगला जन्म हिरण के रूप में लेना पड़ा।

    • aataawaani July 5, 2016 at 4:10 am

      मुझे अति प्यारी लगती और मेरा लिखनेका होसला बढ़ाने वाली मेरी छोटी बहन प्रज्ञा
      तूने मेरा आधा वाक्य”अति सर्वत्र वर्जियत ” पूर्ण किया और उसके बारेमे पूरी कथा भी लिखी मुझे बहुत ख़ुशी हुई में धन्यवाद देता हुँ .

आपके जैसे दोस्तों मेरा होसला बढ़ाते हो .मै जो कुछ हु, ये आपके जैसे दोस्तोकी बदोलत हु, .......आता अताई

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