है बहारे बाग़ दुनिया चंदरोज़

flying
हे बहारे बाग़ दुनिया  चंद रोज़  देखलो इसका तमाशा  चंद  रोज़
अये मुसाफिर  कुचका  सामान कर ,इस जहां में है बसेरा चंद रोज़  १
फिर तुम कहाँ  और मैं कहाँ अये दोसतो
साथ मेरा और तुम्हारा चंद रोज़   २
पूछा लुकमान से जिया तू कितने रोज़
दस्ते मलकर हँसके  बोल चंद रोज़   ३
बादे मदफुन  कबरमे  बोली क़ज़ा
अब यहां पे  सोते रहना  चंद रोज़   ४
क्यों स्टेट हो दिल बे जुर्म को
ज़ालिमो ये है ज़माना चंद रोज़   ५
याद कर तू अय”ज़फ़र “कब्रोके रोज़
जिन्दगीका है भरोसा चंद रोज़   ६
ہے بھرے باغ  دنیا چند روز
 دخلو اسکا تماشا چند ڑوذ ١
ے  مسافر کچکا سامان کر
اس جہاں  مے ہے بصرہ چنک روز  ٢
 فر تم کہاں اور  مے کہاں  ے دوستو
ساتھ میرا اور تمارا  چند روز  ٣
پوچھ  لکمان سے جیا تو کتنے روز
دستے ملکر ہنسکے بولا چند روز  ٤
 بعد-ا مدفون  کبرمے  بولی قزا
اب یہاں پی سوتے رہنا  چند روز  ٥
کیو اسٹیٹ ہو ڈیلے بے جرمکو
ظالمو یہ ہے زمانہ چندروز ٦
ये में जोभी लिखता हुँ ये सिर्फ  मेरे मनोरंजन के  लिए है  हो सकता है की  इसमें कोई गलती  भी हो  आप मेरी गलती बताके मुझे सुधारनेका मौका दे
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6 responses to “है बहारे बाग़ दुनिया चंदरोज़

  1. સુરેશ જૂન 19, 2016 પર 5:25 એ એમ (am)

    સરસ કવિતા ગમી ગઈ. મોર પણ ગમ્યો.

    • aataawaani જૂન 19, 2016 પર 5:41 એ એમ (am)

      આજે મારી લાંબી કવિતામાં ત્રણ કડિયું ઉમેરી છે . જે આપના વાંચવા માટે લખું છું
      आज कलके युवक क्या करते है , ज़िंदगी भरमे कमाई
      डिग्रिलेते नौकरी करते पिंशन कहके मरजाई
      क्यारी बनाओ केसरकि और कस्तूरी खाती खिलाई
      अंगूर रस्का पानी दो पर प्याजकि बॉस न जाई
      ज़िन्दगीमें कोई ग़म न हो तो ज़िन्दगीमें मज़ा नाइ
      रास्ता आसानी वाला होतो , गुमराहकि मज़ा नाइ …संतो भाई समय बड़ा हरजाई

  2. રીતેશ મોકાસણા જૂન 26, 2016 પર 4:44 એ એમ (am)

    આતા, ખૂબ સુંદર ! સાચી વાત છે ચંદ રોજ

    • aataawaani જૂન 26, 2016 પર 6:03 એ એમ (am)

      પ્રિય રિતેશ
      હું ડોબા ચારુ કવિ પણ તારા જેવાને મારી ગઝલો ગમે એવી હોય છે .મોટા ગજાના કવિઓ આઝાદ હોય છે .તેઓ છંદ બંધીમાં માનતા નથી હોતા ; પણ મને પદ્ધતિસરની કવિતાઓ બનાવવી ગમે . એક ગઝલ તારા વાંચવા માટે લખું છું જે ગાલિબની ગઝલ शौक़ हर रंग रक़ीब -ए -सर-ओ – सामा निकला જે આશા ભોસળે , મહમદ રફી વગેરેએ ગાઈ છે એ ઢબ થી મારી ગઝલ ગાઈ શકાય .
      जबसे खुदा को अपने दिलमे बसा रख्खा है
      तबसे हर शख्सको में अपना बना रख्खा है १
      हम तअसुब नहीं रखते यारो .
      तअसुब वाले हमने दूर बिठा रख्खा है २
      रब जो हमारी साथ है तो क्या डर
      हासिद मर्दुमने अपने दिलमे कीना रख्खा है ३
      साजिद है ” आतई ” दोस्तोंका
      बुरे दोस्तोंए खुद तअलुक छोड़ रख्खा है ४
      जबसे खुदाको अपने दिलमे बसा रख्खा है। ……खुदा हाफ़िज़
      جبسے خداکو اپنے دلمے بسا رکھکھا ہے
      تبسے ہر شخصکو می اپنا بنا رکھکھا ہے …١
      ہم تعصب نہی رکھتے یارو
      تعصب والے ہمنے دور بیٹھا رکھکھا ہے …٢
      رب جو ہارے ساتھ ہے تو کیا ڈر
      حاسد مردمنے اپنے دلمے کنا رکھکھا ہے …٣
      ساجد ہے ” اتائی ” دوستوکا

      برے دوستونے خود خود تعلّق کھود رکھخا ہے ٤
      جبسے خداکو اپنے دلمے بسا رکھکھا ہے ……..خدا حافظ

  3. Ritesh જૂન 27, 2016 પર 7:18 એ એમ (am)

    વાહ, ક્યા બાત ! ખૂબ સરસ; ગમી આતા.

  4. aataawaani જૂન 27, 2016 પર 4:50 પી એમ(pm)

    પ્રિય રિતેશ
    તુને ગમ્યું એટલે મને પણ ગમ્યું .

आपके जैसे दोस्तों मेरा होसला बढ़ाते हो .मै जो कुछ हु, ये आपके जैसे दोस्तोकी बदोलत हु, .......आता अताई

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