Daily Archives: જાન્યુઆરી 27, 2016

એક મહિના બાદ

Source: એક મહિના બાદ

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पाटिल साहबकी अधूरी बात पूर्ण

 में  कॉम्पूटरका  इसी लिए शुक्र  गुज़ार हुँ वो मुझे देवनागरी  लिपिमे  लिखने देता है  .  पाटल साहब
कड़क ऑफिसर ज़रूर था  मगर अपनी गलतिको  क़बूल करनेमे  शर्म नही रखता था  . वैसेही सिपाहिकी माफ़ी माँगनेमे उसको संकोच नही होता था  . मेरा  छोटभाई प्रभाशंकर  माधुपुरा पोलिस लाइनमे मेरी साथ रहता था  जब वो कॉलेजमे पढ़ता था   , वो मेरी हम शक्ल था  वो एक बलदेवसिंह  रओलकी रूम इस्तेमाल करता था  क्योकि  बलदेवसिंह   अपना   खानगी  मकानमे  रहता था   .  बलदेवसिंह  की भलमन साईं  मुझे अभी तक याद  है  . इक  दफाका  ज़िक्र है   ,  पाटिल साहबने मुझे   सादे कपड़ेमे  इक लीडरकी सभामे भेजा   ,  थोड़ी देरके बाद  मेरा भाई  कॉलेजसे वापस आया  . वो  इक चुगलखोर  पुलिसने देखा और  पाटिल साहबको बोला  साहब हिम्मतलाल  नोकरिपे नही गया,  और कच्चे कान वाले साहबने उसकी बात मान ली  . में  मेरी नौकरी पूरी होनेके बाद  साहबको  खैरियत्का  रिपोर्ट देने गया   , तब साहबने
 मुझे  धमकाया  और बोले  तुम नौकरी पर नही गए  और मुझे खैरियत्का रिपोर्ट देने आये हो ? तुम दिव्य चक्षुवाल  संजय हो  की घर बैठे  सभाका परिणाम   देख लिया  ,  मुझे  साहबकी बात पर  थोड़ा गुस्सा आया  और बोला  आप लीडर खुदको पूछ सकते हो क्योकि  में उसका भाषण दरम्यान  उसकी पास खड़ा था   . जब सच्ची बातका  उसको पता चला और मुझे  अपनी ऑफिसमे बुलवाया और मुझे बोले तुम मुझे दिलसे माफ़ करदो   मेने बग़ैर  सोचे समझे तुमको धमकाया   ,
मेरी नौकरी  जब चार्ज ऑफिसर तरीके  पोलिस स्टेशनमें थी  तब मुझे मदद  करनेके लिए  दो पुलिस वाले थे  जिसमे इक  कालू मिया करके   बड़ी उम्रका था  वो दुर्भागी   बूढ़ा होने तक  कॉन्स्टेबलकी रेनक्से आगे नही बढ़  सका था   . पाटिल साहबने दया करके  पोलिस स्टेशनमें  मेरी पास रख्खा था  . चार्ज  ऑफिसर को इंस्पेक्टरकी  ग़ैर  हाजरिमे
इंस्पेटरकी सत्ता होती है  . कोई फरियाद आवे तो उसकी स्टेशन डायरीमे  नोंध लेके  उसके बारेमे  योग्य तपास करने के लिए   जिस पोलिस्की हदमे बनाब बना   हो  उसको खबर  सेना होता है  .   इक  बात और आपको  कहना ज़रूरी  समझता  हुँ जो आपको कहता हुँ   . पुलिसको हुक्म हैकि वोह  कोई बनाव की बा त अख़बार वालोको  बिना संकोच कहना  सिवाय के कोई गुप्त बात  जाहिर करना हितावह न हो  . मॉर्निगको  अख़बार वाले  पुलिस स्टेशनमें     फोन करके माहिती मांगते है   . इक दिन अख़बार वालेका फोन आया  .कालू मियांे  ने फोन उठाया  मेने पूछे किसका फोन है ?
 कालू मियांे  ने  फोनके ऊपर बिना हाथ रखे बोला  , ये साले छपे वाले फ़ज़रा फजरी जान खाते  है   , उनको सालुको दूसरा धंधबि क्या है   . मेनेfon लिटा और पाटिल साहबको दिया   . साभने कालू मिया को बुलाया और बोले साले बूढ़े   तुझे बूढ़ा समझके  में पुलिस स्टेशनमें रख्खा  की मंटू घर जाके रोटी भी खाले और पुलिस स्टेशनमें  पठारी लरके बड़े  शोकसे सो बी सकता है जा अभीके अभी दूधेश्वर  चौकी उप्र हजर होजा  और वहां पहुँच कर मुझे फोन कर   . पुलिसके अनुभव मेरी पास बहुत है  मगर में वो अनुभव  सच्चा होगा फिरभी  नही लिखूंगा जिसमे पुलिसकी बदनामी हो   . आखर मेभी तो पुलिस था ?