ये गीत मैंने अपने बारे में लिखाहै

ये गीत  फ़िल्मी गीत जो राजकपूर गाता है”  में दुनियामे हरदम  रोताही रहा हूँ ” इस कदर गया जाएगा

बुत खानेमे जाता हु बुत परस्त नहीं  हूँ ,बुत परस्त नहीं  हूँ बुत शिकन भी नहीं हूँ  बुत शिकन को में साथ कभी देता नहीं हूँ          बुत खानेमे  १

चर्चो में जाताहूँ इसाई नहीं हूँ इसाई नहीं हूँ  इसाको मानताभी हूँ   दलील बाजिमे कभी उतरता भी नहीं  हूँ                             बुत खाने २

मसजिदमे  जाताहूँ मुसलमान नहीं हूँ  मुस्लमान नहीं हूँ  बे ईमान नहीं हूँ  शेख ना कहेतो मसाजिद में जाता नहीं हूँ                  बुतखाने में ३

अगियारिमे मुझको नहीं जाने देते गबरू  नहीं जाने देते गबरू वरना जरुर जाता हूँ अगर जाता तो आतिश का साजिद होता हूँ         बुतखाने में  ४

आदाब करता सबका किसी एक का नहीं हूँ  किसी एक का नहीं  हूँ  तोहिं न  करता नहीं हूँ  में दर्दे दिल इन्सान हूँ  दरिंदा नहीं हूँ      बुतखाने में  ५

मुफलिस हु मगर मिस्कींन नहीं हूँ  मिस्कीं नहीं हूँ हिम्मत्से रहने वाला हूँ  मूत मवलकी  हसद कभी करता नहि हूँ                 बुतखाने में  ६

में  “आताइ “हूँ कोई अल्लामा  नहीं हूँ  अल्लामा नहीं हूँ  इल्म चाह्ताभी हूँ मूत अल्लिम  हूँ कोई मु अल्लिम नहीं हूँ              बुतखाने में   ७

बुतखाना =मंदिर     बुत परस्त = मूर्ति पूजक    बुत शिकन = मूर्ति तोडनार     मसाजिद = मस्जिदों मसजिद नु बहु बचन    अगियारी = पारसिओनु  मंदिर

गबरू = पारसी   आतिश = अग्नि    साजिद = प्रणाम करेलो नत मस्तक    आदाब = आदर   तोहिंन = अनादर   ,अपमान   दरिंदा = फाड़ी खाना र पशु

मुफलिस = गरीब  मिस्कींन = लाचार , बिचारो  मूत मव्वल = पैसादार   हसद = इर्षा  अल्लामा = मोटो विद्वान  मूत अल्लिम = विद्यार्थी  मु अल्लिम = शिक्षक

5 responses to “ये गीत मैंने अपने बारे में लिखाहै

  1. pragnaju October 23, 2013 at 5:02 am

    क्या बात है !
    बाजार से गुजरा हूं पर खरीदार नहीं
    याद आयी

    اُداس لوگوں سے پیار کرنا کوئی تو سیکھے ۔۔

    سفید لمحوں میں رنگ بھرنا کوئی تو سیکھے ۔ ۔

    کوئی تو آئے خزاں میں پتے اُگانے والا
    گلُوں کی خوشبو کو قید کرنا کوئی تو سیکھے ۔ ۔۔

    کوئی دیکھائے محبتوں کے سراب مجھکو ۔ ۔
    میری نگاہوں سے بات کرنا کوئی تو سیکھے ،۔

    کوئی تو آئے نئی رُتوں کا پیام لے کر
    اندھیری راتوں میں چاند بننا کوئی تو سیکھے ۔ ۔

    کوئی پیامبر کوئی امام ِزماں ہی آئے
    اسیر ِذہنوں میں سوچ بھرنا کوئی تو سیکھے

    • aataawaani October 23, 2013 at 7:31 am

       दुनिया में हूँ दुनियाका तलब गार नहीं   हूँ बाजार से गुजरा हूँ  खरीदार नहीं हूँ

      Ataai ~sacha hai dost hagiz juta ho nahi sakta   jal jaega sona firbhi kaalaa ho nahi sakta                Teachers open door, But you must enter by yourself.

      • હિમ્મતલાલ October 23, 2013 at 7:44 am

        दोस्तों में उर्दूमे इतना माहर नहीं हूँ सिर्फ थोडासा जानता हूँ परवर दिगार के करम से उर्दूमे शेर शायरी भी लिख सकता हूँ
        में उर्दू सिखने के लिए कभी मदरसा नहीं गया हूँ
        मुझे उर्दू सिखाने वाला पंजाबका उदासी समपरदाय का साधू था ये मैंने सच्चाई आशकारा करदी खुदा हाफ़िज़

  2. pragnaju October 23, 2013 at 10:22 am

    दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं,
    बाजार से गुजरा हूं खरीदार नहीं हूं,

    जिंदा हूं मगर ज़ीस्त की लज्ज़त नही बाकी,
    हर चंद के हूं होश में, होशियार नहीं हूं,

    इस खान-ए-हस्ती से गुजर जाऊंगा बे-लौस,
    साया हूं फकत नक्श-ए-दीवार नहीं हूं,

    वो गुल हूं खिज़ा ने जिसे बर्बाद किया है,
    उलझूं किसी दामन से, मैं वो खार नहीं हूं,

    या रब मुझे महफूज़ रख उस बुत के सितम से,
    मैं उसकी ईनायत का तलबगार नहीं हूं,

    गो दावा-ए-तक़वा नहीं दरगाह-ए-खुदा में,
    बुत जिससे हो खुश ऐसा गुनहगार नहीं हूं,

    अफसुर्दगी-व-जौफ की कुछ हद नहीं ‘अकबर’,
    काफिर के मुकाबिल में भी दीदार नहीं है।
    -अक़बर इलाहाबादी

    • himmatlal October 23, 2013 at 11:39 am

      प्यारी परगना बेन
      मई बहोत खुश हूं आपने अकबर इलाहबाद्की ग़ज़ल भेजी

आपके जैसे दोस्तों मेरा होसला बढ़ाते हो .मै जो कुछ हु, ये आपके जैसे दोस्तोकी बदोलत हु, .......आता अताई

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