कामिल पुरुष मुझको मिला खुशनूद हुवा ,मिलनेके बाद

સાભાર – શ્રી. હિતેશ દેસાઈ

મેં જે ગઝલ આપને ગઈ સંભળાવી ,એનો યશ સુરેશજાની અને  મુવી લેનાર હિતેશ દેસાઈને આપવાનો છે .બેશક હિતેશની પત્ની મીતા પણ યશભાગી છે કેમકે તે આપના લાડીલા આતા ની પ્રશંશક છે . મને ગાવા માટેની  તૈયારી માટે પુરતો સમય મળેલો નહિ એટલે સંભવ છેકે થોડી ક્ષતિ રહી ગઈ હોય ,એ ગજલ હું અહી લખુછું . તો આપ કોઈ આકર્ષક અવાજ વાળા ગાઈને આપ સહુને સંભળાવી શકે છે .

कामिल पुरुष मुझको मिला खुशनूद हुवा मिलनेके बाद

सब जंजाले (आधी व्याधि )छुट गई ह है बुनको मिल जानेके बाद ….1

एकही दिक् था मेरा वो दिल मैंने अर्पण किया

अब किसीको न दे सकुंगा उनको दे देनेके  बाद ….. 2

ख़र्च  किया वो धन था  तेरा धन था तेरा धन कमालेनेके बाद

बाक़ी धन खर्चेगा कोई तेरे मर्जानेके  बाद ………3

“आता ” मायूस होके  एकदिन बैठाथा  ज़ेरे  शज़र

चल बसी मायूसी उनकी कामिल मिलजाने के बाद …4

खुश नूद =प्रफुल्लित        मायूस = उदास        मायूसी   = उदासीनता   कामिल = महान संत ,ब्रह्म ज्ञानी ,ओलियो

बसी मायूसी

11 responses to “कामिल पुरुष मुझको मिला खुशनूद हुवा ,मिलनेके बाद

  1. pragnaju March 27, 2013 at 4:53 am

    धन्य
    याद
    माहे-कामिल कहूँ कि शाहे-ख़ुदा कहूँ
    हुस्न-बानो कहूँ कि रंगे-फ़िज़ा कहूँ
    आपको कहूँ तो आख़िर मैं क्या कहूँ

    आपका हुस्न तो बेमिसाल है
    रूप, रंग, अदा का विसाल है
    उन्तिस चाँद में भी दाग़ है
    आपका बदन रेशमी आग है

    इस रेशमी आग को कहूँ तो क्या कहूँ
    हुस्न-बानो कहूँ कि रंगे-फ़िज़ा कहूँ

    हुस्न आपका सबसे आला है
    रब ने किस साँचे में ढाला है
    चाँदनी में खिला हुआ कँवल हो
    मुझको अल्लाह का फ़ज़ल हो

    अल्लाह के फ़ज़ल को नाम क्या दूँ
    माहे-कामिल कहूँ कि शाहे-ख़ुदा कहूँ
    फादर कामिल बुल्केको किसीने पूछा, मौलाना आप तो मुसलमान हैं, आप रामायण क्यों पढते हैं. उस व्यक्ति ने केवल एक वाक्य में उत्तर दिया- ’और भी अच्छा मनुष्य बनने के लिये!‘ रामकथा के इस विस्तार को फादर बुल्के वाल्मीकि की दिग्विजय कहते थे, भारतीय संस्कृति की दिग्विजय! इस पूरे प्रसंग पर विस्तार से चर्चा करते हुए डा दिनेश्वर प्रसाद भी नहीं अघाते. २० वर्षों तक वह फादर बुल्के के संपर्क में रहे हैं. उनकी कृतियों, ग्रंथों की भूमिका की रचना में डा प्रसाद की गहरी सहभागिता रही है
    सत्रह अगस्त उन्नीस सौ बयासी को हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय आधार स्तंभ फादर कामिल बुल्के के देहांत के पश्चात प्रख्यात विद्वान (अब स्वर्गीय) श्री शंकर दयाल सिंह ने कहा था, जब कभी अब हिन्दी के बारे में कोई संयत विचार होगा,चाहे वह विश्व हिन्दी सम्मेलन के मंच पर हो या केन्द्रीय समिति की बैठक में अथवा किसी विश्वविद्यालय में या कि किसी सभा-समिति में, रह-रहकर सभी को बस एक चेहरा याद आयेगा -फादर कामिल बुल्के का . बुल्के के लिये उद्गार में कहे गये तब के ये शब्द आज समूचे हिन्दी जगत पर करारा वयंग्य करते हुये से प्रतीत होते हैं. हिन्दी को इसका उचित सम्मान देने, दिलाने की हमारी प्रतिबद्धता अंग्रेजी रूपी पश्चिमी हवा के झोंकें में विलीन हो चुकी है. ऐसे में बुल्के की प्रासंगिकता को गंभीरता से महसूस किये जाने का सवाल ही कहाँ पैदा होता है.

    दरअसल एक विदेशी होने के बावजूद बुल्के ने हिन्दी की सम्मान वृद्धि,इसके विकास,प्रचार-प्रसार और शोध के लिये गहन कार्य कर हिन्दीके उत्थान का जो मार्ग प्रशस्त किया,और हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठादिलाने की जो कोशिशें कीं,वह हम भारतीयों के लिये प्रेरणा के साथ-साथ शर्म का विषय भी है. शर्म का विषय इसलिये क्योंकि एक विदेशी होने के बावजूद हिन्दी के लिये उन्होंने जो किया,हम एक भारतीय और एक हिन्दी भाषी होने के बावजूद उसका कुछ अंश भी नहीं कर पाये. इस शर्म को मिटाने के लिये हमारी ओर से और अधिक दृढ-प्रतिज्ञ और एकनिष्ठ होकर हिन्दी हित में कार्य किये जाने की जरूरत थी जो कि वर्तमान माहौल में फिलहाल संभव नहीं हो पा रहा है. हिन्दी जगत के लिये यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. इससे उबरकर हिन्दी के उत्थान के लिये हमें फादर बुल्के के पद-चिन्हों पर चलने की जरूरत होगी.

  2. Pingback: कामिल पुरुष मुझको मिला खुशनूद हुवा ,मिलनेके बाद | હાસ્ય દરબાર

  3. Sharad Shah March 27, 2013 at 5:38 am

    બહોતખુબ.. આતાજી….મજા આ ગયા. ગઝલભી ગજબકી ઔર અંદાજભી. પહલીવાર આપકો વીડીઓ પર દેખા ઔર લગા પહચાન પુરાની હૈ. ખુદાને ચાહા તો મિલના હોગા.

  4. Vinod R. Patel March 27, 2013 at 9:01 am

    વાહ, આત્તાજીને એમની ગઝલ એમના મુખે ગાતા સાંભળી અને કમ્પ્યુટરના પડદે

    પ્રત્યક્ષ જોઇને ખુબ જ આનંદ થયો .આતાજી જાણે ઘરમાં પધારીને ફેમીલી રૂમના

    સોફા ઉપર બેસીને ગઝલ ગાતા ન હોય એવી પ્રતીતિ થઇ .ધન્ય થઇ ગયા .

    આ શક્ય બનાવવા માટે ભાઈશ્રી હિતેશ દેસાઈ અને શ્રી સુરેશભાઈને ધન્યવાદ .

    આ વિડીયો ઘણા લાંબા સમય સુધી આતાજીની યાદગીરી માટેનું એક નઝરાણું બની રહેશે .

    • aataawaani March 27, 2013 at 9:41 am

       priy vinodbhai tamone gamyu ethi mane khushi thai chhe. Ataai ~sacha hai dost hagiz juta ho nahi sakta   jal jaega sona firbhi kaalaa ho nahi sakta                Teachers open door, But you must enter by yourself.

      ________________________________

  5. હિમ્મતલાલ March 28, 2013 at 5:02 am

    ડો રાજાભાઈ તમે મને ગજલ ગાતા જોયો એ તમને ગમ્યું જાણી મને ખુશી થઇ

  6. હિમ્મતલાલ March 28, 2013 at 4:39 pm

    ફાદર કુત્બે ને અને તમને ધન્યવાદ પ્રજ્ઞાબેન ફરીથી આજ ગજલ સંભળાવી ધન્યવાદ

  7. P.K.Davda March 30, 2013 at 9:18 am

    સલામ આતાજી
    -દાવડા

  8. kuldip April 15, 2013 at 7:44 am

    are jordaaaarrrrrrr nanajjeeeee ….
    tme to bau saras gajal gav chho
    love you nanajee

आपके जैसे दोस्तों मेरा होसला बढ़ाते हो .मै जो कुछ हु, ये आपके जैसे दोस्तोकी बदोलत हु, .......आता अताई

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