ઉપદેશાત્મક ગઝલ

है बहारे बाग दुनिया चंदरोज़ देखलो इसका तमाशा चंदरोज़

अय मुसाफर कुचका सामान कर इस जहां में है बसेरा चंदरोज़

फिर तुम कहाँ और मै कहाँ अय दोसतो साथ मेरा और तुम्हारा चंदरोज़

पूछा लुक्मां से जिया तू कितने रोज़ दस्ते मलकर हंसके बोला चंदरोज़

बाद ए मद्फुन कब्रमे बोली कज़ा अब यहाँ पे सोते रहना चंदरोज़

क्यों सताते हो दिले बे ज़ुर्मको जालिमो ये है ज़माना चंदरोज़

याद कर तू अय “नज़र “कबरोके रोज़ जिन्दगीका है भरोसा चंदरोज़

कूच =प्रयाण बसेरा=रहेनेका स्थान लुक्मां =प्राचीन यूनानी हकीम दस्ते मलकर =हाथ मसलने की क्रिया मद्फ़ुन =डाटा हुवा कज़ा =मोत बेज़ुर्म =निर्दोष

5 responses to “ઉપદેશાત્મક ગઝલ

  1. pragnaju December 17, 2012 at 6:36 pm

    वाह
    बहुत अच्छे
    याद आयी एसी ही गझले
    फ़ैज अहमद फ़ैज का शुमार एशिया के महानतम कवियों में किया जाता है। वे विचारों से साम्यवादी थे और पाकिस्तान कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे। प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के पुरोधाओं में एक, फ़ैज ने पंजाब में प्रगतिशील लेखक संगठन की शाखा (1936) स्थापित की। वे सूफी परंपरा से भी प्रभावित थे, जिसकी झलक उनकी गजलों और नज्मों में मिलती है। कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद वे सेना में भर्ती हुए। 1947 में उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से इस्तीफा दिया और पाकिस्तान चले गए। अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ फ़ैज की शायरी हमेशा मुखरित होती रही, जिसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा और कई वर्षों तक निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। फ़ैज अहमद फ़ैज की शायरी का अनुवाद हिंदी, रूसी, अंग्रेजी आदि कई भाषाओं में हो चुका है
    चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़

    चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
    और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
    अपने अजदाद की मीरास है माज़ूर हैं हम
    जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें है
    फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं
    अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं
    ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिसमें
    हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
    लेकिन अब ज़ुल्म की मीयाद के दिन थोड़े हैं
    इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं
    अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
    हमको रहना है पर यूँ ही तो नहीं रहना है
    अजनबी हाथों के बेनाम गराँबार सितम
    आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
    ये तेरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
    अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
    चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
    दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार
    चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़

    • aataawaani December 18, 2012 at 11:38 am

      પ્રજ્ઞાબેન

      ફૈઝ ની ગઝલ વાંચી બીજી વખત વાંચવી પડશે અને અઘરા શબ્દો સમજવા પડશે .તમારો આભાર

    • aataawaani December 19, 2012 at 6:27 am

      પ્રજ્ઞાબેન
      બહુ સરસ ફૈઝ અહમદ ફૈઝની ગઝલ વાંચવા આપી મને બહુ ગમ્યું આવી રીતે તમે અને ભાઈ અશોક મોઢ વાડિયા મારો ઉત્સાહ ટકાવી રાખજો વધારતા રહેજો આભાર

  2. અશોક મોઢવાડીયા December 19, 2012 at 5:47 am

    ’નજીર’ અકબરાબાદીની આ ગઝલ; કમાલ છે.
    શંકરાચાર્યનું કથન યાદ આવે છે, विद्युच्चलं किं धनयौवनायु: । (ધન, યૌવન અને આયુ, વિજળી સમાન ચંચળ છે)
    અને ગંગાસતી વળી કેમ ભૂલાય,
    ’વિજળીને ચમકારે,
    મોતીડાં પરોવો પાનબાઈ,
    અચાનક અંધારાં થાશે જી.’

    પ્રજ્ઞાબહેને ફૈઝની સુંદર ગઝલનો લાભ આપ્યો. ધન્યવાદ.

    फिर तुम कहाँ और मै कहाँ अय दोसतो,
    साथ मेरा और तुम्हारा चंदरोज़ | ક્યા બ્બાત !

    • aataawaani December 19, 2012 at 6:34 am

      અશોક
      બ્રહ્મ જ્ઞાની જેવાં ગંગા સતી ભૂલી નો શકાય એવાં એનાં વચના મૃતો છે .

आपके जैसे दोस्तों मेरा होसला बढ़ाते हो .मै जो कुछ हु, ये आपके जैसे दोस्तोकी बदोलत हु, .......आता अताई

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