Daily Archives: ડિસેમ્બર 18, 2011

સમય બડા હરજાઇ

प्लवन्ते पास्तारा निरे मानव घ्नानान्ति राक्सासन

कपय: कर्म कुर्वन्ति कालस्य  कुटिला गति: મતલબકે  સમય ની ગતિ બહુ વિચિત્ર હોય છે  પાણા કોઈદી પાણીમાં  તરે પણ સમય એવો હતો .રામને લંકામાં જવું હતું ત્યારે પાણા પાણી ઉપર તર્યા અને  પૂલ બનીગયો . અને માણસો  કોઈદી રાક્ષાસને  મારી શકે ?અને એપણ     રામના સમયમાં શક્ય બન્યું .અને વાંદરા  કોઈદી કામ કરે  અને એપણ  રામના સમયમાં વાંદરાઓએ પુલ બાંધી આપ્યો. એટલેકે સમયની ગતિ બહુ વિચિત્ર હોય છે .समय समय बलवान है नहीं पुरुष बलवान

काबे लुंटी गोपिका  येही अर्जुन येही बान   અર્જુન એજ હતો એનું ગાંડીવ ધનુષ એનું એજ હતું .કે જેને લીધે મહાભારતના યુધ્ધમાં હા હા કાર મચી ગએલો.. પણ સમય એ નહતો .એટલેજ સામાન્ય  લુંટારાઓએ   અર્જુનના રક્ષાણ નીચે રહેલી ગોપીઓને લુંટી લીધી .

હું એક ગીત આપની સમક્ષ રજુ કરું છું’ જેમાં સમયે કેવી હલ ચલ  મચાવી દીધી.  એ વાત આવશે .આ ભજન અનેક ઢબથી ગઈ શકાશે .જેનો રાગ ભૈરવી દીપચંદી છે. भक्त कवी सुरदासका भजन }  नाथ कैसे गजको बांध छुडायो . इसी  ढंग
राम अरु लछमन बन बन भटके संगमे जानकी माई
कंचन मृगके पीछे दोड़े सीता हरण कराइ ———–संतोभाई १
सुवर्ण मई लंका रावनकी जाको समंदरहारे अपने भाई  खाई
दस मस्तक बीस भुजा कटाई इज्ज़त ख़ाक मिलाई   —-संतोभाई २
राजा युध्धिष्ठिर द्युत  क्रिदामे  हारे अपने भाई
राज्यासन धन सम्पति हारे द्रोपदी वस्त्र हराई————संतो भाई ३
योगेश्वरने  गोपिगन को भावसे दिनी विदाई
बावजूद अर्जुन था रक्षक बनमे गोपी लुन्टाई ————संतोभाई ४
जलारामकी परीक्षा करने प्रभु आये वरदाई
साधू जानकी  सेवा करने पत्नी दिनी वीरबाई ———–संतोभाई ५
आजादिके लिए बापूने अहिंसक लड़त चलाई
ऐसे बापुके सीने पर हिन्साने  गोली चलाई ———-संतोभाई ६
देशिंगा दरबार नोरंगसे गदा निराश नाजाई
समा पलटा जब उस नोवरंगका बस्तीसे भिक मंगाई –संतोभाई ७
पानी भरकर बरतन सरपर दोड्की हुई हरिफाई
जवां लड़कियाँ पीछे रहगई भानु पहली आई ———-संतोभाई ८
अब वो भानु चल नहीं सकती निर्बल होती जाई
अपने हाथो खा नहीं सकती कोई खिलावेतो खाई —–संतो भाई ९
दो हज़ार साल अगस्त्की जब दूसरी तारीख आई
इस फानी दुनियाको छोडके भानुने लीनी विदाई ——-संतोभाई १०
विक्रमके दादाकी तनखा माहकी बारा रुपाई
विक्रम खुदकी एक मिनिटकी बढ़कर बारा रुपाई —–संतोभाई ११
नंगेपेर बकरियां चराई कोलेज  डिग्री पाई
कोलगेटने बड़ा बॉस बनाके नई नई शोध करवाई —–संतोभाई १२
एक गुजराती सपुतने श्रीजीसे माया लगाईं
श्रीजी आकेबिराजे  ह्रदयमें मंदिर कई बन जाई ——-संतोभाई १३
गोर्धनभाई पोपटने सिंहको मार गिराई
अब गोर्धनभाई निर्बल होगए मख्खी न मारी जाई —–संतोभाई १४
प्याज्का जब बुरा ज़माना लोक मुफ्त ले जाई
वोही  प्याज अब महँगी होगई गरिबसे खाई न जाई —-संतोभाई १५
घरमे बैठ लिखता पढ़ता यार्दमें करता सफाई
सुरेशाजानिने  कला परखकर जग मशहूर कराई ——=संतोभाई १६
हिल मिल कर रहो जगतमे इच्छो सबकी भलाई
मोततो एक दिन आने वाला क्यों रहो सुखदाई ———-संतोभाई १७
बेर बबुल्की जाड़ीके बिच सोनेवाला अताई
वोही अताई अमरीका आया देखो कैसी जमाई ———संतो भाई १८