शायरी- ई- अताई

હું એક ગઝલ લખીશ એમાં મખ્ખન શબ્દ બંધ બેસતો કેવાય પણ મેં ગ્રીસ શબ્દ વાપર્યો છે એ એટલા માટે કે,  નેતાની પત્ની  એને ચુંબન કરે તો વખતે માખણ  ચાટી જાય પણ જો ગ્રીસ હોય તો કોઈ  ચાટી નોશકે અને નેતાને વધુ નરમ રાખે વળી જરાક રમુજ થાય છતાં તમે મને માર્ગ દર્શન આપીને આભારી કરી શકો છો
तो अब सुनो
सूफी ओलिया मंसूरकी
गजल जैसी
अताई की मशवरा गजल
अगर है शोक कुर्सी का तो हरदम  ग्रीस लगता जा
पकड़ कर पाँव नेताका चरण उनका  तू चूमता जा |
चिंता मत कर गरीबो की फिकर कर अपने वालो की
बिठाकर उनको कुर्सी पर मोज उनको कराता जा |
बहुमति डाल खड्डे में वहीँ  उनको तू रहने दे
लघुमति को चड़ा सरपर हिफाजत  उनकी करता जा |
गिला मत सुन गरीबो की  प्रूफ बन जा तू निंदा से
करे कोई हाय हाय तेरी हांसी उनकी उडाता  जा |
मशवरा है “अताई” की बराबर गोरसे सुन ले
करके कौभान्ड तरकीबसे जेब अपनी तू भरता जा |
जेब भर जाय जब पूरी स्विस बेंक में जमा कर दे
पीरी में गर जरुरत है उठा कर खर्च कराता जा |
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ना अहल है वो अहले  सियासत की नज़र में

वादेसे  कभी जिसको मुकरना नहीं आता |

One response to “शायरी- ई- अताई

  1. dhavalrajgeera December 12, 2011 at 6:23 am

    अगर है शोक कुर्सी का तो हरदम ग्रीस लगता जा
    पकड़ कर पाँव नेताका चरण उनका तू चूमता जा |
    It seems true ……

आपके जैसे दोस्तों मेरा होसला बढ़ाते हो .मै जो कुछ हु, ये आपके जैसे दोस्तोकी बदोलत हु, .......आता अताई

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